मनुष्य पश्चिम का हो या पूरब का, आज की सदी की दहलीज
पर पूरब और पश्चिम एक हो गए है | हम सभी पश्चिम से प्रभावित है | अगर हम दर्शन की
बात करे तो सबसे पहले जिस दार्शनिक का नाम आता है वो है सुकरात | आम तौर पर हम सभी
बस इतना जानते है की कुछ धर्म विरोधी बाते करने पर इन्हें विष दे दिया गया | पर यह
सत्य नहीं है | सुकरात को हम तर्क शास्त्री कह सकते है | अब यह बात उठती है की
तर्क का क्या अर्थ है | यही सोच दर्शन और विज्ञान को एक करती है | सुकरात का शिष्य
प्लेटो और प्लेटो का शिष्य अरस्तू भी तर्क शास्त्री थे | ये अपनी बातों पर
इतने अडिग रहते थे की अपने गुरुओ की आलोचना
करने से भी नहीं डरे |
एक तरह से हम अपने को अरस्तू
का वंशज कह सकते है | हमारा तर्क, हमारी सोच, हमारी बुद्धि अरस्तू की तर्क सारणी
से बनी है | अरस्तू ने तर्क का जो ढाँचा दिया है वह मनुष्य के मस्तिस्क में इतना
गहरा खुद गया है कि आधुनिक मनुष्य उससे अन्यथा
सोच भी नहीं सकता |
हम दर्शन के इतिहास को तीन भागो में बाँट सकते है:-
- प्राचीन दर्शन |
- ईसाईयत के उदय के बाद धार्मिक दर्शन |
- विज्ञान के युग के प्रारंभ के पश्चात जन्मा आधुनिक दर्शन |प्राचीन दर्शन ईसा पूर्व का समय है | इसमें ग्रीक दार्शनिकों का योगदान था | इसमें पाइथागोरस, हेराक्लाइटस, इनक्सा, गोरस आदि वैज्ञानिक थे | यह वह समय था जब चीजे संयुक्त थी, जीवन बंटा नहीं था | पाइथागोरस गणितज्ञ था और दार्शनिक भी था | आज हमें यह शायद अचरज लगे लेकिन जब गणित गहराई में उतरता है तो दर्शन में प्रवेश करता है | ग्रीक दार्शनिकों ने जो गणित और ज्यामितीय में खोजे की उससे हमारा संगीत, खगोल विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान और दर्शन प्रभावित है |पाइथागोरस के साथ गणित और धर्म विज्ञान का समन्वय शुरू हुआ | सुकरात ,प्लेटो और अरस्तू यह त्रिमूर्ति पूरे दर्शन शास्त्र की आधारशिला है | सुकरात की चेतना में इतनी सृजन की क्षमता थी कि वह आगे दो पीढियों तक अपनी विचारधारा को चला सका | सुकरात मन के पास था ,प्लेटो मन के अंतरिक्ष में था और अरस्तू बुद्धि की जमीन पर उतर आया था| विश्लेषण और तर्क उनके भवन की आधार शिला थी |इसके बाद धीरे धीरे ग्रीक संस्कृति की खिलखिलाहट कम होती गयी | दर्शन अब धार्मिक बन गया | विश्वास प्रधान हो गया | पोप लगभग ईश्वर का विकल्प हो गया | लोग साम्राज्यवाद में उलझे रहें | राजनीति ने मनुष्य के जीवन को इस कदर जकड़ लिया कि दर्शन भी राजनैतिक हो गया | इस मध्य युग में मैकियावेली एक बेवाक और स्पष्टवक्ता था | राजनीति और समाज में फैले हुए पाखंड और बेईमानी के लिए उसकी सीधे नुकीले वक्तव्य झेलना बर्दास्त के बाहर था | वह कहता था कि यदि राज्य १०० प्रतिशत स्वर्ण हो तो नष्ट हो जायेगा |
सत्रहवी शताब्दी ने एक क्वांटम लीप (समग्र छलांग) लगाई | इससे मानव जीवन ही नहीं पूरी पृथ्वी कि शक्ल ही बदल गयी | इस सदी में चार वैज्ञानिक हुए जिन्होंने विज्ञान युग कि नीव रखी | कोपरनिकस, कैपलर, गैलीलियो और न्यूटन | इन वैज्ञानिको ने अपनी प्रयोगशाला में जो खोजे की उसने मनुष्य को एकदम यथार्थ के धरातल पर खड़ा कर दिया | इन्होने आधुनिक विज्ञान कि नींव रखी | इन वैज्ञानिको के पास दो असाधारण गुण थे ,अपरिसीमित धीरज के साथ निरिक्षण करना और अपने निष्कर्षो को बहुत साहस के साथ प्रस्तुत करना क्योकि उनके निष्कर्ष धर्म और बाइबिल के विपरीत थे |अब तक पृथ्वी ब्रम्हांड का केन्द्र थी और गैलीलियो ने दिखा दिया कि बेचारी छोटी सी पृथ्वी बहुत बड़े सूरज का चक्कर लगा रही है | विज्ञान की खोजे धार्मिक अहंकार पर बड़ी चोटे थी |वैज्ञानिक वातावरण ने एक नए किस्म के दर्शन को जन्म दिया :-वैज्ञानिक दर्शन | मनुष्य की पूरी मानसिकता ही बदल रही थी | आधुनिक वैज्ञानिक दर्शन का जनक है डेकार्ट | अरस्तू के बाद यह पहला बुलंद दार्शनिक था जिसके विचारों में ताजगी थी | डेकार्ट के दर्शन में संदेह सबसे बड़ी विधि थी | वह हर चीज पर संदेह करता था | यहाँ तक कि स्वयं पर भी | उसका प्रसिद्ध वाक्य था “ I THINK,THEREFORE I AM”, मै सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ |डेकार्ट के बाद फिर एक बार दर्शन का अभ्युत्थान हुआ और दार्शनिकों की लम्बी श्रृंखला चली | स्पिन झा, फ्रांसिस, बेकन, लाक, ह्यूम, बर्कले, हीगल और काम्ट | इन्हें हम बुद्धिवादी दार्शनिक कह सकते है |उन्नीसवीं शताब्दी में दर्शन का एक शिखर पैदा हुआ जर्मनी में- इमानुयल काम्ट | उसके अनुसार चाहे बच्चा हो या बूढ़ा वह किसी और की मर्जी से या दूसरों के इशारों पर चले यह सबसे भयंकर बात है|यहाँ से ईश्वर का अस्तित्व डावांडोल हो जाता है और अंततः उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पैदा हुआ नीत्से घोषित करता है कि “ GOD IS DEAD”, (ईश्वर मर चुका) |दर्शन और विज्ञान के बीच हमेशा ही तर्क वितर्क की स्थिति रही है | ये स्थिति भारत में उतनी गंभीर नहीं है जितनी कि पाश्चात्य देशो में है| इसका कारण यह है कि भारतीय आम तौर पर जन्म से धार्मिक होते है, विज्ञान उन्हें शिक्षा के रूप में प्राप्त होता है | इसलिए विज्ञान उन्हें चुनौती नहीं देता है |दर्शन अपने पूरे इतिहास में दो हिस्सों से बना है और इन दो हिस्सों का आपस में कोई मेल नहीं है | एक तरफ वह एक सिद्धांत है जो इस सम्बन्ध में सोचता है कि विश्व कैसे बना है और दूसरी तरफ एक नैतिक या राजनैतिक नियम जो हमारे जीवन को बेहतर बना सके | एक भी दार्शनिक इन दोनों को अलग नहीं कर सका | सच तो यह है कि मानवीय बुद्धि उन सभी प्रश्नों के सुनिश्चित उत्तर पाने में असमर्थ है जो मनुष्य जाति के लिए बहुत गहन अर्थो में महत्वपूर्ण है | जैसे संख्या क्या है? स्थान और समय क्या है? मन और पदार्थ के मायने क्या है? यह नहीं कहा जा सकता कि इन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए जा सकते है लेकिन अब एक ऐसी विधि खोज ली गयी है जिसके द्वारा हम उत्तर दे सकते है जो सत्य के बहुत करीब हो |यह विधि है वैज्ञानिक अन्वेषण और निरीक्षण |
