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Monday, May 23, 2016

पाश्चात्य दर्शन और विज्ञान


      मनुष्य पश्चिम का हो या पूरब का, आज की सदी की दहलीज पर पूरब और पश्चिम एक हो गए है | हम सभी पश्चिम से प्रभावित है | अगर हम दर्शन की बात करे तो सबसे पहले जिस दार्शनिक का नाम आता है वो है सुकरात | आम तौर पर हम सभी बस इतना जानते है की कुछ धर्म विरोधी बाते करने पर इन्हें विष दे दिया गया | पर यह सत्य नहीं है | सुकरात को हम तर्क शास्त्री कह सकते है | अब यह बात उठती है की तर्क का क्या अर्थ है | यही सोच दर्शन और विज्ञान को एक करती है | सुकरात का शिष्य प्लेटो और प्लेटो का शिष्य अरस्तू भी तर्क शास्त्री थे | ये अपनी बातों पर इतने  अडिग रहते थे की अपने गुरुओ की आलोचना करने से भी नहीं डरे |



                         एक तरह से हम अपने को अरस्तू का वंशज कह सकते है | हमारा तर्क, हमारी सोच, हमारी बुद्धि अरस्तू की तर्क सारणी से बनी है | अरस्तू ने तर्क का जो ढाँचा दिया है वह मनुष्य के मस्तिस्क में इतना गहरा  खुद गया है कि आधुनिक मनुष्य उससे अन्यथा सोच भी नहीं सकता |

हम दर्शन के इतिहास को तीन भागो में बाँट सकते है:-

  1. प्राचीन दर्शन |
  2. ईसाईयत के उदय के बाद  धार्मिक दर्शन |
  3. विज्ञान के युग के प्रारंभ के पश्चात जन्मा आधुनिक दर्शन | 

                प्राचीन दर्शन ईसा पूर्व का समय है | इसमें ग्रीक दार्शनिकों का योगदान था | इसमें पाइथागोरस, हेराक्लाइटस, इनक्सा, गोरस आदि वैज्ञानिक थे | यह वह समय था जब चीजे संयुक्त थी, जीवन बंटा नहीं था | पाइथागोरस गणितज्ञ था और दार्शनिक भी था | आज हमें यह शायद अचरज लगे लेकिन जब गणित गहराई में उतरता है तो दर्शन में प्रवेश करता है | ग्रीक दार्शनिकों ने जो गणित और ज्यामितीय में खोजे की उससे हमारा संगीत, खगोल विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान और दर्शन प्रभावित है |

               पाइथागोरस के साथ गणित और धर्म विज्ञान का समन्वय शुरू हुआ | सुकरात ,प्लेटो और अरस्तू यह त्रिमूर्ति पूरे दर्शन शास्त्र की आधारशिला है | सुकरात की चेतना में इतनी सृजन की क्षमता थी कि वह आगे दो पीढियों तक अपनी विचारधारा को चला सका | सुकरात मन के पास था ,प्लेटो मन के अंतरिक्ष में था और अरस्तू बुद्धि की जमीन पर उतर आया था| विश्लेषण और तर्क उनके भवन की आधार शिला थी |

              इसके बाद धीरे धीरे ग्रीक संस्कृति की खिलखिलाहट कम होती गयी | दर्शन अब धार्मिक बन गया | विश्वास प्रधान हो गया | पोप लगभग ईश्वर का विकल्प हो गया | लोग  साम्राज्यवाद में उलझे रहें | राजनीति ने मनुष्य के जीवन को इस कदर जकड़ लिया कि दर्शन भी राजनैतिक हो गया | इस मध्य युग में मैकियावेली एक बेवाक और स्पष्टवक्ता था | राजनीति और समाज में फैले हुए पाखंड और बेईमानी के लिए उसकी सीधे नुकीले वक्तव्य झेलना बर्दास्त के बाहर था | वह कहता था कि यदि राज्य १०० प्रतिशत स्वर्ण हो तो नष्ट हो जायेगा |


                        सत्रहवी शताब्दी ने एक क्वांटम लीप (समग्र छलांग) लगाई | इससे मानव जीवन ही नहीं पूरी पृथ्वी कि शक्ल ही बदल गयी | इस सदी में चार वैज्ञानिक हुए जिन्होंने विज्ञान युग कि नीव रखी | कोपरनिकस, कैपलर, गैलीलियो और न्यूटन | इन वैज्ञानिको ने अपनी प्रयोगशाला में जो खोजे की उसने मनुष्य को एकदम यथार्थ के धरातल पर खड़ा कर दिया | इन्होने आधुनिक विज्ञान कि नींव रखी | इन वैज्ञानिको के पास दो असाधारण गुण थे ,अपरिसीमित धीरज के साथ निरिक्षण करना और अपने निष्कर्षो को बहुत साहस के साथ प्रस्तुत करना क्योकि उनके निष्कर्ष धर्म और बाइबिल के विपरीत थे |

                        अब तक पृथ्वी ब्रम्हांड का केन्द्र थी और गैलीलियो ने दिखा दिया कि बेचारी छोटी सी पृथ्वी बहुत बड़े सूरज का चक्कर लगा रही है | विज्ञान की  खोजे धार्मिक अहंकार पर बड़ी चोटे थी |
                        वैज्ञानिक वातावरण ने  एक नए किस्म के दर्शन को जन्म दिया :-वैज्ञानिक दर्शन | मनुष्य की पूरी मानसिकता ही बदल रही थी | आधुनिक वैज्ञानिक दर्शन का जनक है डेकार्ट | अरस्तू के बाद  यह पहला बुलंद दार्शनिक था जिसके विचारों में ताजगी थी | डेकार्ट के दर्शन में संदेह सबसे बड़ी विधि थी | वह हर चीज पर संदेह करता था | यहाँ तक कि स्वयं पर भी | उसका प्रसिद्ध वाक्य था “ I THINK,THEREFORE I AM”, मै सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ |

                        डेकार्ट के बाद फिर एक बार दर्शन का अभ्युत्थान हुआ और दार्शनिकों की लम्बी श्रृंखला चली | स्पिन झा, फ्रांसिस, बेकन, लाक, ह्यूम, बर्कले, हीगल और काम्ट | इन्हें हम बुद्धिवादी दार्शनिक कह सकते है |

                        उन्नीसवीं शताब्दी में दर्शन का एक शिखर पैदा हुआ जर्मनी में- इमानुयल काम्ट | उसके अनुसार चाहे बच्चा हो या बूढ़ा वह किसी और की मर्जी से या दूसरों के इशारों पर चले यह सबसे भयंकर बात है|

                         यहाँ से ईश्वर का अस्तित्व डावांडोल हो जाता है और अंततः उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पैदा हुआ नीत्से घोषित करता है कि “ GOD IS DEAD”, (ईश्वर मर चुका) |

                        दर्शन और विज्ञान के बीच हमेशा ही तर्क वितर्क की स्थिति रही है | ये स्थिति भारत में उतनी गंभीर नहीं है जितनी कि पाश्चात्य देशो में है| इसका कारण यह है कि भारतीय आम तौर पर जन्म से धार्मिक होते है, विज्ञान उन्हें शिक्षा के रूप में प्राप्त होता है | इसलिए विज्ञान उन्हें चुनौती नहीं देता है |

                        दर्शन अपने पूरे इतिहास में दो हिस्सों से बना है और इन दो हिस्सों का आपस में कोई मेल नहीं है | एक तरफ वह एक सिद्धांत है जो इस सम्बन्ध में सोचता है कि विश्व कैसे बना है और दूसरी तरफ एक नैतिक या राजनैतिक नियम जो हमारे जीवन को बेहतर बना सके | एक भी दार्शनिक इन दोनों को अलग नहीं कर सका | सच तो यह है कि मानवीय बुद्धि उन सभी प्रश्नों के सुनिश्चित उत्तर पाने में असमर्थ है जो मनुष्य जाति के लिए बहुत गहन अर्थो में महत्वपूर्ण है | जैसे संख्या क्या है? स्थान और समय क्या है? मन और पदार्थ के मायने क्या है? यह नहीं कहा जा सकता कि इन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए जा सकते है लेकिन अब एक ऐसी विधि खोज ली गयी है जिसके द्वारा हम उत्तर दे सकते है जो सत्य के बहुत करीब हो |
          यह विधि है वैज्ञानिक अन्वेषण और निरीक्षण |  

Friday, May 20, 2016

भारत एक सहयोगी संघवाद का आदर्श



            संघात्मक शासन दोहरे राजतंत्र का अस्तित्व है। जब दो सरकारें अस्तित्व में हो जैसे संघात्मक शासन की सरकार (भारत में केंद्रीय सरकार) और एकात्मक सरकार (भारत में प्रादेशिक सरकार) यह दोनो प्रकार की सरकारें  एक दूसरे की इकाई नहीं है बल्कि यह एक दूसरे की सहयोगी हैं और पूरी तरह से स्वतंत्र भारतीय संविधान की एक अदभुत विशेषता यह है कि इसमें वह लक्षण है, जो संघात्मक शासन के अस्तित्व के लिए आवश्यक है और एक शर्त रखता है, राज्य सरकार की तुलना में संघात्मक सरकार को शक्तिशाली बनाने को तथापि भारतीय संविधान कुछ समय के लिए केंद्रीकृत संघ हो सकता है
 सहकारी संघवाद
सहकारी संघवाद की अवधारणा ऑस्ट्रेलिया की संविधान की उपज है संघ का आधुनिक दृष्टिकोण संघवाद और एक कार्यात्मक व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करने का दृष्टिकोण है न कि केंद्र और राज्य के बीच शक्ति के बंटवारे के रूप में संघात्मक शासन का एक अर्थ यह भी है कि केंद्र और राज्य के बीच सहयोगी संबंध हो न कि स्पर्धा हम भारतीयों में कुछ विशेष संवैधानिक निर्माण कला है, जो कि सहयोगी संघवाद की आत्मा को प्रोत्साहित करती है
भारत में संघ व्यवस्था के तीन प्रतिमान पाए जाते हैं:-
 1.सहकारी संघवाद
2. सौदेबाजी वाला संघवाद
3.एकात्मक संघवाद
सहकारी संघवाद भारतीय परिप्रेक्ष्य में
यह कल्पना की जाती है कि जब केंद्र और राज्यों में एक ही राजनीतिक दल की सरकार होगी तो संघात्मक व्यवस्था केवल नाम की रह जाती है इस आधार पर हम देखें तो भारत में 1967 तक केवल व्यवहार में ही संघात्मक शासन रहा क्योंकि दोनों में ही लगभग कांग्रेस की सरकारें काम कर रही थी उस काल में भारत में एकात्मक शासन का रूप देखने को मिलता है हालांकि इन वर्षों में भी राज्यों की सरकारों और केंद्र की सरकार में मतभेद दिखाई पड़े मुंबई के मोरारजी देसाई, पश्चिम बंगाल के बी. सी. राय, उत्तर प्रदेश के गोविंद बल्लभ पंत तथा पंजाब के प्रताप सिंह ऐसे ही मुख्यमंत्री रहे जो केंद्र सरकार के दबाव में नहीं थेइस काल के पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन ने 1965 में केंद्र सरकार द्वारा पंजाब में बी.एस.एफ. के भेजे जाने का विरोध किया इसी समय पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉक्टर बी. सी. रॉय ने योजना आयोग को चुनौती देते हुए बंगाल में कुछ प्रोजेक्ट्स की स्थापना के लिए विदेशी मुद्रा का प्रत्यक्ष रुप से प्रबंध करने की धमकी तक दे डाली थी
1975 के आपातकाल की घोषणा के साथ केंद्र की शक्तियों में अपार वृद्धि हुईइस काल में राज्यों के मुख्यमंत्रियों की स्थिति कमजोर ही रही ।1977 से 1989 तक सहकारी संघवाद की स्थिति अपेक्षाकृत कम प्रभावी रही । 1989 से 1991 तक केंद्र में उथल-पुथल रहा इन वर्षों में संघवाद केवल जिंदा ही रहा और एक स्वस्थ सहकारी संघवाद का ढांचा नहीं बन पाया
1991 से 1995 तक नरसिम्हा राव ने राजनीति का समझौताकारी रवैया अपनायाउन्होंने सभी पार्टियों की बैठक की और भारतीय अखंड संघ के अधीन कूटनीतिक मामलों और सांप्रदायिक मुद्दों पर बहस कीउन्होंने मुख्यमंत्रियों की बैठक कर राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा की आवश्यकता, कृषि की समस्या पर संवाद किया सभी मुख्यमंत्रियों को राष्ट्रीय निर्णयों के लिए एकजुट किया, जिससे ना केवल सहयोगी संघवाद को शक्तिशाली बनाने में मदद मिली बल्कि राज्यों ने अपनी बाध्यता को समझा और केंद्र ने भी अपनी सीमा को पहचाना
1996 -1997   में राष्ट्रीय मोर्चा के नेतृत्व में केंद्र में देवेगौड़ा की सरकार बनी 1996 में मुख्यमंत्रियों क्षेत्रीय नेताओं ने हैदराबाद में बैठक की और इस मुद्दे पर चर्चा की कि भारत में संघात्मक संबंधों को कैसे बढ़ाया जाए ? उस बैठक का नारा था "केंद्र के बिना संघ"( फेडरेशन विदाउट सेंटर ) क्योंकि उनका विश्वास था कि संयुक्त मोर्चा की सरकार का निर्माण भारत में संघीय संबंधों का श्रेष्ठतम उदाहरण प्रस्तुत करता है
1998 से 2003 में भारतीय जनता पार्टी की सत्ता रही तीन नए राज्यों का निर्माण जनजातीय आधार पर किया गया यह ध्यान देने योग्य है कि यह नए राज्य भारत के ढांचे में उभरे जो कि राज्यों का एक संघ हैयह इस विश्वास का प्रतीक है कि हमारा संघवाद जीवित और अग्रगामी है भारतीय संघवाद विभिन्न अंतर क्षेत्रीय, सांप्रदायिक, नस्लीय और जनजातीय आकांक्षाओं के पूर्ण करने के प्रयोग को बढ़ावा देता है 2003 में बोडो, डोगरी, मैथली और संथाली को भी संविधान में जोड़कर सहकारी संघवाद की प्रगति की दिशा में एक और कदम बढ़ाया गया
2003 में कांग्रेस अन्य सहयोगी दलों के साथ सत्ता में आई यह केंद्र को साबित करने का समय था और सरकार सूझ बूझ के साथ काम कर रही थीफिर भी इसे राज्यों से धमकियों का सामना करना पड़ रहा था और अंततः बहुमत साबित करना पड़ा। उसके बाद कांग्रेस की सरकार ने सहकारी संघवाद का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया। जनवरी 2009 में तथा जून 2009 में दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठकें होती रही। पर इन बैठकों में आतंकवाद, पीने का पानी, शौचालय, ग्रामीण विकास ही प्रमुख मुद्दे रहे दिसंबर 2012 में डॉक्टर मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठक हुई जिसमें राष्ट्रीय विकास परिषद और 12वीं पंचवर्षीय योजना को अंतिम रूप देने पर विचार विमर्श हुआ
            वर्तमान में केंद्र में बीजेपी की सरकार है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरा प्रयास कर रहे हैं कि वह सहकारी संघवाद के रास्ते पर चलें। नीति आयोग की हर महीने की बैठक में वह मुख्यमंत्रियों को आमंत्रित करते हैं उनके विचार जानना चाहते हैं मुख्यमंत्री भी अपने-अपने राज्यों की समस्याओं को केंद्र तक पहुंचा रहे हैं वर्तमान में भी जिन राज्यों में बीजेपी  की सरकार नहीं है, उन राज्यों से तालमेल बैठाना केंद्र के लिए अभी टेढ़ी खीर साबित हो रही हैयद्यपि आज भारतीय जनता पार्टी प्रभावी पार्टी है, पर इसके मार्ग में सहकारी संघवाद बनाने में बहुत कठिनाइयां हैं इन कठिनाइयों को हटा कर एक स्वस्थ और शक्तिशाली संघीय राज्य बनाया जा सकता है
नीति आयोग (योजना आयोग का बदला हुआ नाम) को भारत में सहकारी संघवाद एवं नीतिगत समन्वय बनाने के लिए स्थापित किया गया है। लेकिन वर्तमान में नीति आयोग के कार्यों में राज्यों की उचित भागीदारी न होना, केंद्र – राज्य संबंधो के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है।
नीति आयोग को अंतर्राज्यीय समझौतों को बढ़ावा देने, नीतिगत समन्यवयता लाने तथा केंद्र एवं राज्यों के बीच सहकारी संघवाद के उद्देश्य को पूरा करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।
नीति आयोग के वर्तमान संस्थागत ढांचे में कुछ बुनियादी ख़ामियाँ मौजूद है तथा इसके बेहतर संचालन एवं कार्यान्वयन के लिए इन ख़ामियों को दूर करने की आवश्यकता है।
नीति आयोग की सफलता, पूर्णतः राज्यों की भागीदारी पर निर्भर करती है। हालाकि, नीति आयोग को केंद्र सरकार की संस्था माना जाता है परन्तु राज्यों के मुख्यमंत्री, इसकी गवर्निंग काउंसिल का हिस्सा है ।
भारतीय अर्थव्यवस्था, वर्तमान में विकास की गति को तीव्र करने एवं धारणीय विकास को हासिल करने के लिए संघर्षत है। इसका मुख्य कारण, एक ऐसी संस्था का अभाव है जो, विवाद की स्थिति में अंतर्राज्यीय समझौतों एवं विवादों के निपटारे में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सके |

वर्तमान में संघवाद को चुनौतियां:-
 21वीं सदी में संघवाद को सहयोगी बनाना अस्तित्व के लिए आवश्यक है वैश्विक पर्यावरण परिवर्तन से राज्यों की सीमाएं नहीं बदलतेप्रदूषण और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे राज्य केंद्र के मुद्दे ना होकर स्थानीय मुद्दे होने चाहिए भारतीय संघ पूरे विश्व में एकता और मानवता का अनुपम उदाहरण है इसकी विखंडता की प्रवृत्ति क्षेत्रों की विधि संगत शिकायतें और राज्य संघीय संविधान के लिए काम कर सकती हैंसबसे ज्यादा ध्यान देने योग्य, ताकतवर राष्ट्र के संदर्भ में, आवश्यक है इसकी आंतरिक सुरक्षा और संरक्षण, जो बिना एक सहकारी संघवाद के संभव नहीं हैआतंकवाद ,संगठित अपराध ,शरणार्थी, उग्रवाद ये सभी समस्याएं राज्य और केंद्र एकसाथ मिलकर हल कर सकते हैं आवश्यकता है एक साथ आगे आने कीमात्र सहकारी संघवाद ही सभी समस्याओं का सामना कर सकता है , क्योंकि इसमें लचीलापन है और आघात सहने की क्षमता है
निष्कर्ष:-
राज्य और केंद्र के संबंध वास्तव में भारतीय राष्ट्रवाद का हृदय है यह भारत के विकास की पहली सीढ़ी हैकेंद्र और राज्य दोनों को एक सहकारी संघवाद बनाने में मिल-जुल कर राष्ट्र के लिए काम करना होगा भारत विभिन्नता का एक सुंदर पिघलता हुआ घड़ा है इसकी मूल्यों को देखभाल की जरूरत है और इसके लिए सहकारी संघवाद से बेहतर कोई मार्ग नहीं है
 संदर्भ ग्रंथ सूची एवं अन्य सहयोग:-
1.         अशोक चन्द्रा : भारत में संघवाद
2.         . यस.काबुर : भारत में केंद्र राज्य संबंध
3.         बी.डी.दुआ एवं एम. पी. सिंह : नई शताब्दी में भारतीय संघवाद
4.         डी. डी. बसु : भारत का संविधान
5.         नरेंद्र कुमार : भारत का संवैधानिक कानून
6.         पुखराज जैन : भारतीय शासन एवं राजनीति
 रिपोर्ट:-
1.         9वीं योजना आयोग रिपोर्ट(1997 से 2007 )
2.         रिपोर्ट ऑफ सेंटर& स्टेट रिलेशन इंक्वायरी कमेटी (1971 )
3.         सरकारिया आयोग रिपोर्ट  (1988 )
4.         वीरप्पा मोइली आयोग रिपोर्ट (2005)
5.         वेंकट चलाइया आयोग रिपोर्ट (2002 )
न्यूज़ पोर्टल :-
1.         www.ndtv.com
2.         www.aajtak.com
3.         www.livehindustan.com
4.         www.jagran.com

Friday, May 13, 2016

"साहित्य में राजनितिक विचारधारा"


"गरीबो का घर लूट कर विलायत का घर भरना  तुम्हारा काम  है । इसलिए इस देश में तुम्हारा जन्म हुआ है ? साहब सच बताओ जब तुम स्वराज का नाम लेते हो उसका कौन सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है। तुम भी  बड़ी-बड़ी तलब लोगे , तुम भी अंग्रेजों की तरह बंगलों में रहोगे , पहाड़ की हवा खाओगे, अंग्रेजी ठाठ बनाए घूमोगे। इस स्वराज से देश का क्या भला होगा? अभी जब तुम्हारा राज नहीं है तब तो तुम लोग भोग-विलास पर इतना मरते हो  जब तुम्हारा राज हो जाएगा तब तो तुम गरीबों को पीसकर पी जाओगे "

(गबन )

" यह आजादी झूठी है देश की जनता भूखी है"

( मैला आंचल )

"कांग्रेस हिंदुओं की जमात है उसके साथ मुसलमानों का कोई वास्ता नही है।" (तमस)

समस्त उपरोक्त  कथन ,पंक्तियां , गद्य किसी नेताओं के भाषण नहीं बल्कि उपन्यास कविता और कहानियों के कुछ हिस्से मात्र हैं । एक साहित्यकार के मन में भी राजनीतिक उथल-पुथल होती रहती है । हर मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी भी होता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। किसी साहित्यकार की आंखों के सामने जो भी घटनाएं घटित होती है, उसे वह पंक्तियों में बद्ध कर देता है और फिर हमारे सामने कविता, लेखन ,उपन्यास और नाटक के माध्यम से सामने आता है। लोग कहते हैं कि एक साहित्यकार को राजनीति में दखल नहीं देना चाहिए जबकि यह गलत है। साहित्यकार कितना भी कोशिश कर ले स्वयं को राजनीति के प्रभाव से वंचित नहीं रह सकता।

भारत-पाकिस्तान का बंटवारा एक राजनीतिक घटना थी लेकिन अगर हम साहित्य के इतिहास को खंगाले तो  इस घटना पर तमाम उपन्यास ,कहानियां नाटक और कविताएं मिल जाती

साहित्य ,समाज और राजनीति इन तीनो की उत्पत्ति के मूल में मनुष्य ही है।