"गरीबो का घर लूट कर विलायत का घर भरना तुम्हारा काम है । इसलिए इस देश में तुम्हारा जन्म हुआ है
? साहब
सच बताओ जब तुम स्वराज का नाम लेते हो उसका कौन सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है। तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे , तुम भी अंग्रेजों की तरह बंगलों में रहोगे , पहाड़
की हवा खाओगे, अंग्रेजी
ठाठ बनाए घूमोगे। इस स्वराज से देश का क्या भला होगा? अभी जब तुम्हारा राज नहीं है तब तो तुम लोग भोग-विलास पर
इतना मरते हो जब तुम्हारा राज हो
जाएगा तब तो तुम गरीबों को पीसकर पी जाओगे ।"
(गबन )
"
यह आजादी झूठी है देश की जनता भूखी है"
(
मैला आंचल )
"कांग्रेस हिंदुओं की जमात है उसके साथ मुसलमानों का कोई वास्ता नही है।" (तमस)
समस्त उपरोक्त कथन ,पंक्तियां , गद्य किसी नेताओं के भाषण नहीं बल्कि उपन्यास कविता और कहानियों के कुछ हिस्से मात्र हैं । एक साहित्यकार के मन में भी राजनीतिक उथल-पुथल होती रहती है । हर मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी भी होता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। किसी साहित्यकार की आंखों के सामने जो भी घटनाएं घटित होती है, उसे वह पंक्तियों में बद्ध कर देता है और फिर हमारे सामने कविता, लेखन ,उपन्यास और नाटक के माध्यम से सामने आता है। लोग कहते हैं कि एक साहित्यकार को राजनीति में दखल नहीं देना चाहिए जबकि यह गलत है। साहित्यकार कितना भी कोशिश कर ले स्वयं को राजनीति के प्रभाव से वंचित नहीं रह सकता।
भारत-पाकिस्तान का बंटवारा एक राजनीतिक घटना थी लेकिन अगर हम साहित्य के इतिहास को खंगाले तो इस घटना पर तमाम उपन्यास ,कहानियां नाटक और कविताएं मिल जाती ।
साहित्य ,समाज और राजनीति इन तीनो की उत्पत्ति के मूल में मनुष्य ही है।
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