संघात्मक
शासन दोहरे राजतंत्र का अस्तित्व है। जब दो सरकारें अस्तित्व में हो जैसे संघात्मक
शासन की सरकार (भारत में केंद्रीय सरकार) और एकात्मक सरकार (भारत
में प्रादेशिक सरकार) ।
यह दोनो
प्रकार की सरकारें
एक दूसरे की इकाई नहीं है बल्कि यह एक दूसरे की
सहयोगी हैं और पूरी तरह से स्वतंत्र । भारतीय संविधान की एक अदभुत विशेषता यह
है कि इसमें वह लक्षण है, जो संघात्मक शासन के अस्तित्व के लिए आवश्यक है और एक शर्त
रखता है, राज्य सरकार की तुलना
में संघात्मक सरकार को शक्तिशाली बनाने को । तथापि भारतीय संविधान
कुछ समय के लिए केंद्रीकृत संघ हो सकता है।
सहकारी संघवाद
सहकारी
संघवाद की अवधारणा ऑस्ट्रेलिया की संविधान
की उपज है । संघ
का आधुनिक दृष्टिकोण संघवाद और एक कार्यात्मक व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करने का दृष्टिकोण
है न कि
केंद्र
और राज्य के बीच शक्ति के बंटवारे के रूप में । संघात्मक शासन का एक
अर्थ यह भी है कि केंद्र और राज्य के बीच सहयोगी संबंध हो न कि स्पर्धा । हम
भारतीयों में कुछ विशेष संवैधानिक निर्माण कला है, जो कि सहयोगी संघवाद की आत्मा
को प्रोत्साहित करती है ।
भारत में संघ
व्यवस्था के तीन प्रतिमान पाए जाते हैं:-
1.सहकारी संघवाद
2. सौदेबाजी वाला संघवाद
3.एकात्मक संघवाद
सहकारी संघवाद भारतीय
परिप्रेक्ष्य में
यह
कल्पना की जाती है कि जब केंद्र और राज्यों में एक ही राजनीतिक दल की सरकार होगी
तो संघात्मक व्यवस्था केवल नाम की रह जाती है । इस आधार पर हम देखें
तो भारत में 1967 तक केवल व्यवहार में ही संघात्मक शासन रहा क्योंकि दोनों में ही लगभग
कांग्रेस की सरकारें काम
कर रही
थी ।उस काल में भारत में
एकात्मक शासन का रूप देखने को मिलता है । हालांकि इन वर्षों में भी राज्यों की सरकारों और केंद्र
की सरकार में मतभेद दिखाई पड़े । मुंबई
के मोरारजी देसाई, पश्चिम बंगाल के
बी. सी. राय, उत्तर प्रदेश
के गोविंद बल्लभ पंत तथा पंजाब के प्रताप सिंह ऐसे ही मुख्यमंत्री रहे जो केंद्र सरकार
के दबाव में नहीं थे।
इस काल
के पंजाब के
मुख्यमंत्री
रामकिशन ने 1965 में केंद्र सरकार द्वारा पंजाब में बी.एस.एफ. के भेजे जाने का विरोध
किया । इसी
समय पश्चिम बंगाल के
मुख्यमंत्री
डॉक्टर बी.
सी. रॉय ने योजना आयोग को चुनौती
देते हुए बंगाल में कुछ प्रोजेक्ट्स की स्थापना के लिए विदेशी मुद्रा का प्रत्यक्ष
रुप से प्रबंध करने की धमकी तक दे
डाली थी
।
1975
के आपातकाल की घोषणा के साथ केंद्र की शक्तियों में अपार वृद्धि हुई। इस काल में राज्यों
के मुख्यमंत्रियों की स्थिति कमजोर ही रही ।1977 से 1989 तक सहकारी संघवाद
की स्थिति अपेक्षाकृत कम प्रभावी रही । 1989 से 1991 तक केंद्र में उथल-पुथल
रहा । इन
वर्षों में संघवाद केवल जिंदा ही रहा और एक स्वस्थ सहकारी संघवाद का ढांचा नहीं बन
पाया ।
1991
से 1995 तक नरसिम्हा राव ने राजनीति का समझौताकारी रवैया अपनाया। उन्होंने सभी पार्टियों
की बैठक की और भारतीय अखंड संघ के अधीन कूटनीतिक मामलों और सांप्रदायिक मुद्दों पर
बहस की।
उन्होंने मुख्यमंत्रियों
की बैठक कर राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा की आवश्यकता, कृषि
की समस्या पर संवाद किया । सभी
मुख्यमंत्रियों को राष्ट्रीय
निर्णयों के लिए एकजुट किया, जिससे ना केवल सहयोगी संघवाद को शक्तिशाली बनाने में मदद
मिली बल्कि राज्यों ने अपनी बाध्यता को समझा और केंद्र ने भी अपनी सीमा को पहचाना ।
1996
-1997 में राष्ट्रीय मोर्चा के नेतृत्व में केंद्र में
देवेगौड़ा की सरकार बनी ।1996 में मुख्यमंत्रियों
क्षेत्रीय नेताओं ने हैदराबाद में बैठक की और इस मुद्दे पर चर्चा की कि भारत में संघात्मक
संबंधों को कैसे बढ़ाया जाए ? उस
बैठक का नारा था "केंद्र के बिना संघ"( फेडरेशन विदाउट
ए
सेंटर
)
। क्योंकि उनका विश्वास
था कि संयुक्त मोर्चा की सरकार का निर्माण भारत में संघीय संबंधों का श्रेष्ठतम उदाहरण
प्रस्तुत करता है ।
1998
से 2003 में भारतीय जनता पार्टी की सत्ता रही । तीन नए राज्यों का निर्माण जनजातीय
आधार पर किया गया । यह
ध्यान देने योग्य है कि यह नए राज्य भारत के ढांचे में उभरे जो कि राज्यों का एक संघ
है। यह इस विश्वास का प्रतीक
है कि हमारा संघवाद जीवित और अग्रगामी है । भारतीय संघवाद विभिन्न
अंतर क्षेत्रीय, सांप्रदायिक, नस्लीय और जनजातीय आकांक्षाओं के पूर्ण करने के प्रयोग
को बढ़ावा देता है। 2003 में बोडो, डोगरी,
मैथली और संथाली को भी संविधान में जोड़कर सहकारी संघवाद की प्रगति की दिशा में एक
और कदम बढ़ाया गया ।
2003
में कांग्रेस अन्य सहयोगी दलों के साथ सत्ता में आई । यह केंद्र को साबित करने का समय
था और सरकार सूझ
बूझ के
साथ काम
कर रही
थी। फिर भी इसे राज्यों
से धमकियों का सामना करना पड़ रहा था और अंततः बहुमत साबित करना पड़ा। उसके बाद
कांग्रेस की सरकार ने सहकारी संघवाद का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया। जनवरी 2009 में तथा जून
2009 में दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठकें होती रही। पर इन बैठकों में आतंकवाद, पीने
का पानी, शौचालय, ग्रामीण विकास ही प्रमुख मुद्दे रहे । दिसंबर 2012 में डॉक्टर
मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठक हुई जिसमें राष्ट्रीय
विकास परिषद और 12वीं पंचवर्षीय योजना को अंतिम रूप देने पर विचार विमर्श हुआ ।
वर्तमान में केंद्र
में बीजेपी की सरकार है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरा प्रयास कर रहे हैं कि वह
सहकारी संघवाद के रास्ते पर चलें।
नीति आयोग
की हर महीने की बैठक में वह मुख्यमंत्रियों को आमंत्रित करते हैं । उनके
विचार जानना चाहते हैं । मुख्यमंत्री
भी अपने-अपने राज्यों की समस्याओं को केंद्र तक पहुंचा रहे हैं । वर्तमान
में भी जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार नहीं है, उन राज्यों से तालमेल
बैठाना केंद्र के लिए अभी टेढ़ी खीर साबित हो रही है। यद्यपि आज भारतीय जनता पार्टी प्रभावी पार्टी है, पर इसके मार्ग में सहकारी
संघवाद बनाने में बहुत कठिनाइयां हैं । इन कठिनाइयों को हटा कर एक स्वस्थ और शक्तिशाली संघीय
राज्य बनाया जा सकता है ।
नीति
आयोग (योजना आयोग का बदला
हुआ नाम) को
भारत में सहकारी संघवाद एवं नीतिगत समन्वय बनाने के लिए स्थापित किया गया है।
लेकिन वर्तमान में नीति आयोग के कार्यों में राज्यों की उचित भागीदारी न होना,
केंद्र – राज्य संबंधो के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है।
नीति
आयोग को अंतर्राज्यीय समझौतों को बढ़ावा देने, नीतिगत समन्यवयता लाने तथा केंद्र
एवं राज्यों के बीच सहकारी संघवाद के उद्देश्य को पूरा करने में एक महत्वपूर्ण
भूमिका निभानी होगी।
नीति
आयोग के वर्तमान संस्थागत ढांचे में कुछ बुनियादी ख़ामियाँ मौजूद है तथा इसके
बेहतर संचालन एवं कार्यान्वयन के लिए इन ख़ामियों को दूर करने की आवश्यकता है।
नीति
आयोग की सफलता, पूर्णतः राज्यों की भागीदारी पर निर्भर करती है। हालाकि, नीति आयोग
को केंद्र सरकार की संस्था माना जाता है परन्तु राज्यों के मुख्यमंत्री, इसकी
गवर्निंग काउंसिल का हिस्सा है ।
भारतीय
अर्थव्यवस्था, वर्तमान में विकास की गति को तीव्र करने एवं धारणीय विकास को हासिल
करने के लिए संघर्षत है। इसका मुख्य कारण, एक ऐसी संस्था का अभाव है जो, विवाद की
स्थिति में अंतर्राज्यीय समझौतों एवं विवादों के निपटारे में महत्त्वपूर्ण भूमिका
निभा सके |
वर्तमान में संघवाद
को चुनौतियां:-
21वीं सदी में संघवाद को सहयोगी बनाना अस्तित्व के
लिए आवश्यक है । वैश्विक
पर्यावरण परिवर्तन से राज्यों की सीमाएं नहीं बदलते। प्रदूषण और पर्यावरण संरक्षण के
मुद्दे राज्य केंद्र के मुद्दे ना होकर स्थानीय मुद्दे होने चाहिए । भारतीय
संघ पूरे विश्व में एकता और मानवता का अनुपम उदाहरण है । इसकी विखंडता की प्रवृत्ति
क्षेत्रों की विधि संगत शिकायतें और राज्य संघीय संविधान के लिए काम कर सकती हैं। सबसे ज्यादा ध्यान देने
योग्य, ताकतवर राष्ट्र के संदर्भ में, आवश्यक है इसकी आंतरिक सुरक्षा और संरक्षण, जो
बिना एक सहकारी संघवाद के संभव नहीं है। आतंकवाद ,संगठित अपराध ,शरणार्थी, उग्रवाद ये सभी समस्याएं राज्य
और केंद्र एकसाथ मिलकर हल कर सकते हैं । आवश्यकता है एक साथ आगे आने की। मात्र सहकारी संघवाद
ही सभी समस्याओं का सामना कर सकता है , क्योंकि इसमें लचीलापन है और आघात
सहने की क्षमता है।
निष्कर्ष:-
राज्य
और केंद्र के संबंध वास्तव में भारतीय राष्ट्रवाद का हृदय है । यह
भारत के विकास की पहली सीढ़ी है।
केंद्र
और राज्य दोनों को एक सहकारी संघवाद बनाने में मिल-जुल कर
राष्ट्र के लिए काम
करना होगा ।
भारत विभिन्नता
का एक सुंदर पिघलता हुआ घड़ा है । इसकी
मूल्यों को देखभाल की जरूरत है और इसके लिए सहकारी संघवाद से बेहतर कोई मार्ग नहीं
है।
संदर्भ ग्रंथ सूची एवं
अन्य सहयोग:-
1. अशोक चन्द्रा : भारत
में संघवाद
2. ए. यस.काबुर : भारत में केंद्र राज्य
संबंध
3. बी.डी.दुआ एवं एम. पी. सिंह : नई
शताब्दी में भारतीय संघवाद
4.
डी. डी. बसु : भारत
का संविधान
5. नरेंद्र कुमार :
भारत का
संवैधानिक कानून
6. पुखराज जैन : भारतीय
शासन एवं राजनीति
रिपोर्ट:-
1. 9वीं योजना आयोग रिपोर्ट(1997 से
2007 )
2. रिपोर्ट ऑफ सेंटर& स्टेट रिलेशन
इंक्वायरी कमेटी (1971 )
3. सरकारिया आयोग रिपोर्ट (1988 )
4. वीरप्पा मोइली आयोग रिपोर्ट (2005)
5. वेंकट चलाइया आयोग रिपोर्ट (2002 )
न्यूज़ पोर्टल :-
1. www.ndtv.com
2. www.aajtak.com
3. www.livehindustan.com
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thank u miss Bhawna for submitting this topic
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