स्मार्ट विलेज की अवधारणा
गाँधी जी के सपनों का
भारत बनाने में वैश्विक साधनों का प्रयोग स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप करना ही स्मार्ट
विलेज के अवधारणा का मूल तत्व है। कहा जाता है कि असली भारत गांव में ही बसता है, पर दुर्भाग्य से आज भी
गांवों तक इतनी सुविधा नहीं पहुंच पाई जितनी
वांछनीय थी।
गांवों को विकसित बनाने के उद्देश्य से सरकार की तरफ
से कई योजनाएं बनाई गई। इन्हीं योजनाओं में से एक योजना है स्मार्ट विलेज या सांसद आदर्श ग्राम योजना। स्मार्ट विलेज का मतलब
है विकास के आयाम गांव में स्थापित करना, गांवों में अच्छी शिक्षा के साथ साथ स्वास्थ्य, नारी सशक्तिकरण , सुरक्षा, शुद्ध पेयजल , शौचालयों की व्यवस्था, पौष्टिक भोजन एवं आय
के उचित स्रोत उपलब्ध कराना।
लिंगानुपात सही होने के साथ लोकतांत्रिक माहौल तैयार
करना। बिजली,
बैंक,
अक्षय ऊर्जा, इंटरनेट की सुविधा के साथ-साथ मनोरंजन का भी ध्यान देना स्मार्ट विलेज की वांछनीय विशेषता है। भारत सरकार ने वर्तमान में सभी सांसदो
से अपने क्षेत्र के 3-3 गांव को गोद लेने की योजना बनाई है, जिन्हें पूर्ण रूप से उपरोक्त सभी सुविधाओं से सुसज्जित
करके 2019 तक स्मार्ट विलेज बना
देना है।
गांव के सभी योजनाओं गांव के लोग ही बनाए। योजनाएं पारदर्शी
हों ,
भ्रष्टाचार मुक्त हों सरकारी योजनाएं लकीर की फकीर न हों बल्कि वास्तविक आवश्यकता
के अनुरूप हों। सहकारिता पर जोर दिया जाए। संचार व्यवस्था के लाभ की जानकारी और इसका
लाभ प्रत्येक ग्रामीण को उपलब्ध कराना, विलेज या स्मार्ट विलेज
की उपयोगिता को सही साबित करता है।
आजादी के 68 वर्ष बाद भी हजारों की
संख्या में ऐसे गाँव हैं जहाँ मूलभूत सुविधाओं का आभाव है। कई ऐसे गाँव हैं जो बरसात
में टापू बन जातें है। जीवन के अंधेरे से भारत के ग्रामवासी आज भी लड़ने के लिए मजबूर
हैं। दरअसल आज़ादी के बाद ग्रामीण विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के बावजूद पंचवर्षीय
योजनाओं के अन्तर्गत अरबों रूपये खर्च करने बाद भी गांवों की सुरत ज्यादा नहीं बदली।
चूंकि देश में गरीबी, बेरोजगारी, कम पढ़ाई-लिखाई का सबसे
बड़ा प्रतिशत गांव में ही है इसलिए उन्हें किसी भी कीमत में इतनी महत्त्वाकांक्षी योजना
से महरूम नहीं किया जाना चाहिए। वैसे प्रधानमंत्री ने गांवों को विकसित करने के लिए
प्रत्येक सांसद से एक गांव को गोद लेने का आग्रह किया है। इस आदर्श ग्राम में भी लगभग
वही आकांक्षाएं और उम्मीदें की गई हैं जो कि एक स्मार्ट शहर से लगाई गई हैं। अगर प्रधानमंत्री
की बात सभी सांसद मान लेते हैं और उनके आह्वान के मुताबिक एक गांव को गोद भी ले लेते
हैं तो भी इससे महज 700 गांवों तक का ही विकास हो सकता है वो भी जब युद्धस्तर
पर सभी सांसद 100 फीसदी नतीजा दें।
भारत में एक स्मार्ट
शहर को विकसित करने हेतु कम से कम 5०००० करोड़ की राशि की आवश्यकता होती है। यदि शहर महानगर
श्रेणी का हो तो 1०००००० करोड़ की राशि भी कम पड सकती है। वहीँ एक गाँव को शहर
के मुकाबले केवल 50 से 7० करोड़ की राशि खर्च कर स्मार्ट बनाया जा सकता है। एक
स्मार्ट गांव को विकसित करने के लिए उसके घर पक्के होने चाहिए, गांव की सड़के पक्की न
हों तो भी उनमें अच्छी क्वालिटी का खड़ंजा होना चाहिए, गांव से पानी के निकास
के लिए समुचित नाली की व्यवस्था हो, हर घर में शौचालय की व्यवस्था हो, स्वच्छ पीने के पानी
के लिए गांव की आबादी के मुताबिक टंकी हो, पानी शुद्ध करने का आधुनिक
तरीका हो और वितरण की चूक रहित व्यवस्था हो।
इसके साथ ही गांव में
प्राइमरी से लेकर 12वीं तक की अगर नहीं तो कम से कम 10वीं तक की शिक्षा की
व्यवस्था हो,
कम से कम दो सामुदायिक भवन हो, बच्चों के खेल कूद के लिए एक आदर्श मैदान हो, स्वस्थ्य चेतना को बढ़ाने
और बरकरार रखने के लिए जिम या दूसरे स्वस्थ रहने के उपाय हों, बरसात के पानी की समुचित
निकासी व्यवस्था हो, और वर्षा जल भंडारण के लिए कम से कम दो बड़े तालाब हों।
गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हो वहां कम से कम एक प्रशिक्षित डॉक्टर और उसके
कम से कम दो प्रशिक्षित या अनुभवी सहायक हो। इस सबके साथ गांव के हर एक व्यक्ति को
काम हो या काम उपलब्ध कराये जाने की कुशल व्यवस्था हो।
एक गांव जब स्वस्थ, आत्मनिर्भर और स्मार्ट
बनेगा तो वह खुद तो ऐसा होगा ही अपने प्रभाव से इर्द-गिर्द के कई गांवों को भी स्वस्थ, आत्मनिर्भर और स्मार्ट
बनाने में मदद करेगा। साथ ही जो सबसे बड़ा फायदा होगा वो यह है कि जब गांव स्मार्ट बनेंगे
तो वो शहरों पर बोझ कम डालेंगे और इस तरह से शहर बिना कुछ किए भी स्मार्ट बनने की तरफ
बढ़ने लगेंगे। इसलिए गांवों को स्मार्ट बनाने के लिए उतनी ही बड़ी जरूरत है जितना की
शहरों को।
जबकि अगर स्मार्ट शहरों
की तरह वृहद पैमाने पर केंद्रीय आयोजना की रूपरेखा बनाकर स्मार्ट विलेज विकसित किए
जाएं तो हर साल कम से 10,000 गांवों को बहुत आसानी से विकसित
किया जा सकता है और 5 सालों में तकरीबन 10 से 15 फीसदी गांवों को स्मार्ट
बनाया जा सकता है जो 100 शहरों को स्मार्ट बनाए जाने के मुकाबले कहीं ज्यादा
लाभकारी साबित होगा। इसलिए शहरों से ज्यादा हिंदुस्तान के गांवों को स्मार्ट बनाए जाने
की जरूरत है। गुजरात मॉडल की इतनी चर्चा के बाद भी ये बहस कभी रुकी नहीं कि यह मॉडल
है क्या लेकिन अहमदाबाद से कुछ ही दूरी पर स्थित एक गांव मॉडल विलेज का नमूना बन गया
है।
स्मार्ट विलेज का अनुपम उदाहरण
जब आप भारत के किसी गाँव
की कल्पना करते हैं तो आम तौर पर क्या सोचते हैं? कच्चे मकान, तंग और गंदी गलियां, नाली, पानी और बिजली की सुविधाओं
का न होना। लेकिन गुजरात में पुनसारी गाँव में शहर की सभी सुविधाएं हैं। हालांकि रूप
गाँव का ही है. देश का पहला ऐसा गाँव अहमदाबाद से 90 किलोमीटर की दूरी पर
है,
जिसे स्मार्ट विलेज (गाँव) कहा जा रहा है। छह हज़ार की आबादी वाले गाँव के हर घर
में बिजली और पानी की सुविधा है। यहाँ पानी के निकासी की व्यवस्था भी है। यहाँ पीने
के मिनरल वॉटर (पानी) का भी अलग से इंतज़ाम है।
पूरे गाँव में वाई-फाई
है,
सीसीटीवी कैमरे जगह-जगह पर लगे हैं। गाँव की गतिविधियों को सरपंच अपने दफ़्तर के
एक बड़े स्क्रीन पर भी देख सकते हैं और अपने स्मार्टफोन के स्क्रीन पर भी। पूरे गाँव
में जगह-जगह पर 150 लाउडस्पीकर्स लगे हैं, इनसे सरपंच की घोषणा
लोगों तक पहुँचाने में मदद मिलती है। इसे स्मार्ट विलेज इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि
यहाँ के दो प्राइमरी स्कूल भी स्मार्ट स्कूल हैं। कोई विद्यार्थी बीच में पढ़ाई नहीं
छोड़ता और यहाँ परीक्षाओं के नतीजे सबसे अच्छे होते हैं। यहाँ छोटे बच्चों को कंप्यूटर
ऑपरेट करने की ट्रेनिंग दी जाती है।
अब तक इसे स्मार्ट बनाने
में कितने पैसे खर्च किए गए हैं? सरपंच कहते हैं, ’’वर्ष 2006 से 2012 तक सभी योजनाओं में 14 करोड़ रुपए खर्च आए और
ये सभी पैसे राज्य और केंद्रीय सरकारों की ग्रामीण योजनाओं से आए।“
इस गाँव ने ये साबित
कर दिया है कि सरकारी योजनाओं के सही इस्तेमाल से देश के दूसरे गाँव भी प्रगति कर सकते
हैं. मॉडल या स्मार्ट गाँव बन सकते हैं। पुनसारी स्मार्ट विलेज का उद्देश्य था गाँव
से रोज़ी रोटी के लिए शहरों को जाने के सिलसिले को रोकना। अब तो लोग गाँव को वापस लौट
रहे हैं. अब तक कई परिवार मुंबई से वापस गाँव
लौट चुके हैं।
अब जिस तरह से केंद्र
सरकार और कई राज्य सरकारों ने इस गाँव में दिलचस्पी दिखाई है उससे ये उम्मीद बंधी है
कि देश भर में स्मार्ट गाँवों की संख्या बढ़ेगी।
एक और उदाहरण छत्तीसगढ़
के चांपा जिले के ग्राम करमंदी का है। ग्रामीणों के समन्वित प्रयास से ही आज ग्राम
पंचायत करमंदी को जिले का पहला खुले में शौच से मुक्त ग्राम पंचायत बनने का गौरव प्राप्त
हुआ है। यहां के लोगों ने शासन की योजना से जुड़कर न केवल अपने घरों में शौचालय का निर्माण
कराया बल्कि उसका नियमित रूप से उपयोग भी सुनिश्चित किया इसके साथ ही पूरे ग्रामवासियों
ने प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के तहत अपना बीमा भी सुनिश्चित कराया। इससे करमंदी
के ग्रामीणों ने अपने गांव को एक स्मार्ट विलेज के रूप में विकसित कर लिया है।
हालिया कुछ महीनों के
दौरान मौसमी मार के कारण फसलों की तबाही झेलने वाले हरियाणा के 500 गांवों को क्लाइमेट स्मार्ट
विलेज के तौर पर विकसित करने की योजना है। उल्लेखनीय है कि हरियाणा पिछले कुछ समय के
दौरान विभिन्न तरह की प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने को मजबूर हुआ है। राज्य के सामने
आई विपदा को सामने रखते हुए राज्य स्तरीय स्टीयरिंग कमिटी ने मौसम के बदलावों पर मंथन
करते हुए प्रदेश में 500 गांवों को क्लाइमेट स्मार्ट विलेज के तौर पर विकसित
करने के प्रोजेक्ट को हाथ में लिया है।
भारत के गांवों को स्मार्ट
विलेज बनाने के लिए सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं के साथ ग्रामवासियों के समन्वित
प्रयास से सफलता प्राप्त की जा सकेगी एवं अतिकाधिक गांवों को विकसित किया जा सकता है।
स्रोत सूचि :-
1. विकिपीडिया
2. दैनिक जागरण सम्पादकीय
3. इंडिया टुडे पत्रिका
5. दूरदर्शन किसान चैनल एवं अन्य
समाचार चैनल

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